रमज़ान मुबारक़ और हमारी कार्यशैली

अनवार अहमद नूर-(अनुवाद)

-मौहम्मद यासीन कासमी जहाज़ी-

इस्लामी जगत के मशहूर जानकार हज़रत मौलाना कारी मोहम्मद तय्यब साहब ने एक जगह लिखा है कि इंसानी तहज़ीब व तरबियत के लिए दो चीज़े ज़रुरी हैं

1-तखलिया (आंतरिक मनो इच्छा) यानि नफ्स से बुरी बातों को छुड़ाना

2–तहलिया यानि नफ्स में अच्छी बातें पैदा करना

रमज़ान में दिन के रोज़े के ज़रिये संयुक्त रूप में नफ्स को मांझा जाता है और रात को इस साफ़ सुथरे जर्फ़ – कल्ब पर तिलावत व तरावीह (नमाज़ और इबादात) से कलई (रंग चढ़ाना) की जाती है जिससे वह चमक उठता है

अल्लाह ताअला ने हमारे नफ्स की ततहीर व तजकिया (शुद्धता उज्ज्वलता) के लिए रमज़ान में दिन को रोज़ा और रात में तरावीह का सिस्टम मुकर्रर किया है इसलिए एक मोमिन हमेशा रमज़ान का इंतज़ार करता है ताकि वह इस मुकद्दस (पवित्र) महीने की बरकत व सआदत (लाभों) से लाभान्वित हो सके एक हदीस में भी है कि (अनुवाद) अगर मेरी उम्मत को रमज़ान के खैर बरकत (लाभ) मालूम हो जाएँ तो उसकी तमन्ना यह होगी कि काश पूरा साल ही रमज़ान बन जाए सहाबा कराम और औलिया कराम की सीरतों (व्यक्तित्व -व्यवहार) से पता चलता है कि वह लोग रमज़ान का बेसब्री से इंतज़ार करते थे और कई महीने पहले ही रमज़ान के इस्तकबाल (स्वागत) की तैयारियां शुरू कर देते थे रमज़ान के इस्तकबाल के सम्बन्ध से खुद हदीस में आता है कि आप (सल्ल 0) सहाबा की मजलिस में बड़ी प्रमुखता के साथ इरशाद फरमाते हैं कि अनुवाद ‘’कौन तुम्हारा इस्तकबाल कर रहा है और तुम किस का इस्तकबाल कर रहे हो, आख़िर हदीस में इसका राज़ बताते हुए सरवरे कायनात फरमाते हैं कि एक ऐसा महीना आ रहा है जिसकी पहली रात को ही सब अहले क़िबला की मगफरत हो जाती है इस इरशाद को सुनने के बाद सहाबा रमज़ान के इस्तकबाल के लिए बिल्कुल जोश खरोश से भर जाते हैं

माहे सियाम (रमज़ान) पिछले बरस से अभी तलक, तू ही बसा हुआ है दिले बेकरार में, दुनिया के तूल व अर्ज़ में लाखों करोड़ों लोग, आँखें बिछा चुके हैं तेरे इंतज़ार में, और हो रहा है मस्जिदों में रंग व रोगन आजकल हर तरफ मेहराब व मेम्बर पर नया सा नूर है पूछते हैं चाँद से गुम्बद व मीनार भी रहमतों का वह महीना हम से कितना दूर है

एक मोमिन की शान यह है कि उसे रमज़ान मुकद्दस (पवित्र) के सम्बन्ध से जोश भरा और पूरी तरह से इस्तकबाल करने वाला हो जाना चाहिए लेकिन अफ़सोस कि हम लोग इस जज़्बे से वंचित नज़र आते हैं आज हमारा हाल यह है कि हमारे बहुत से लोग इस्तकबाल (स्वागत)तो दूर,रमज़ान को एक कैद और रूटीन लाइफ के लिए बोझ समझते हैं बहुत से लोग इससे आगे की हरकत करते हुए कहतें हैं कि क्या हमारे घर में खाने की चीज़ नही है जो रोज़ा रखें

कुछ लोगों को अपने बारे में यह गलत फहमी है कि हम रोज़े की शिद्दत (भूख प्यास) बर्दास्त नहीं कर सकते इसलिए रोज़ा ही नहीं रखते, कुछ लोग मस्जिद और मुस्लिम क्षेत्रों से दूर रहतें हैं तो इस वजह से रोज़ा नमाज़ पर ध्यान नहीं देते, कुछ लोगों की चर्या यह भी है कि जिस दिन जी चाहा रख लिया और तरावीह पढ़ ली और जिस दिन सुस्ती आई दोनों को छोड़ दिया संक्षिप्त में यह है कि रमज़ान हमारे शौक व रगबत के अनुसार नहीं बल्कि नफ्स की इच्छानुसार गुजरता है जिसका परिणाम यह निकलता है कि हम इस सम्माननीय,इज्ज़त और बरकत वाले महीने के लाभों बरकतों और रहमतों से वंचित रहतें हैं और पूरा रमज़ान गुज़र जाने के बावजूद न तो हम अपने नफ्स का तखलिया कर पातें हैं और न ही तहलिया। अल्लाहताला माह रमज़ान का इस्तकबाल करने और इसके रोज़ा व तरावीह अदा करने की तौफीक़ –अता फरमाए –आमीन

 

साभार वेबवार्ता

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