महाकवि गोपाल दास नीरज का निधन

देश के जानेमाने कवि पद्मभूषण गोपाल दास नीरज का आज शाम (गुरुवार) को नई दिल्ली स्थित एम्स में निधन हो गया। वे 94 साल के थे। एक दिन पहले सांस लेने में दिक्कत के चलते उन्हें आगरा से नई दिल्ली के एम्स के ट्रामा सेंटर के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। हिन्दी कवि, शिक्षक, साहित्यकार, शिक्षक एवं कवि नीरज देश की पहली शख्सियत हैं जिन्हें शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में भारत सरकार ने दो बार सम्मानित किया, पहले पद्म श्री से, उसके बाद पद्म भूषण से। उन्हें फ़िल्मों में सर्वश्रेष्ठ गीत लेखन के लिये लगातार तीन बार फ़िल्म फेयर पुरस्कार भी मिला।
गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ का जन्म 4 जनवरी 1925 को उत्तर प्रदेश तत्कालीन संयुक्त प्रान्त के इटावा ज़िले के पुरावली गांव में बाबू ब्रज किशोर सक्सेना के घर हुआ था। सिर्फ 6 साल की आयु में पिता का देहांत हो गया। 1942 में इटावा से हाई स्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। उन्होंने शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की। लम्बी बेकारी के बाद ये दिल्ली चले और वहां सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। यहां नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डी०ए०वी कॉलेज में क्लर्क हो गए। उसके बाद बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कम्पनी में पांच साल तक टाइपिस्ट का काम किया। नौकरी करने के साथ प्राइवेट परीक्षाएं देकर 1949 में इण्टरमीडिएट, 1951 में बीए और 1953 में प्रथम श्रेणी में हिन्दी साहित्य से एमए किया। इसके बाद इन्होंने मेरठ कॉलेज, मेरठ में हिन्दी प्रवक्ता के पद पर कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया। उसके बाद यह अलीगढ़ के धर्म समाज कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक नियुक्त हो गये और मैरिस रोड जनकपुरी अलीगढ़ में स्थायी आवास बनाकर रहने लगे।
उन्होंने फिल्मों अनेक फिल्मों में कई लोकप्रिय गीत लिखे, कन्यादान, मेरा नाम जोकर, शर्मीली और प्रेम पुजारी आदि उनकी मशहूर फिल्में हैं। ‘कन्यादान’ का मशहूर गाना ‘लिखे जो खत तुझे…’ आज भी लोग सुनते और गुनगुनाते हैं। बेहतरीन गीतों की रचना के लिए तीन बार उन्हें फ़िल्म फेयर का अवार्ड भी मिला। उनकी मशहूर फिल्में हैं दुनिया, पतंगा, कन्यादान, मझली दीदी, मेरा दिल तेरे लिए, मेरा नाम जोकर, आरती। उनकी प्रमुख कृतियां हैं कारवां गुज़र गया, तुम्हारे लिए, बदर बरस गयो रे, नीरज की पाती, दर्द दिया है, प्राणगीत, आवासरी, नदी किनारे, लहर पुकारे, नीरज की गीतिकाएं आदि।
उन्होंने अपने बारे में एक शेर कहा था जिसे बड़ी फरमाईश के साथ सुना जाता था।

इतने बदनाम हुए हम तो इस ज़माने में, लगेंगीआपको सदियाँ हमें भुलाने में,

न पीने का सलीका न पिलाने का शऊर, ऐसे भी लोग चले आये हैं मयखाने में।

Related posts

Leave a Comment