या हुसैन की सदाओं के बीच सुपुर्द-ए-खाक हुए ताजिये

  • मुनीब हुसैन । शार्ज़िल ज़ैदी

बरेली। मुहर्रम की दसवीं तारीख यौम-ए-आशूरा के मौके पर ताजियों का जुलूस निकाला गया। इस मौके पर नम आंखों और भरे दिलों से मुस्लिम समुदाय के लोगों ने कर्बला के 72 शहीदों को खिराजे अकीदत पेश की। उधर शिया समुदाय ने भी इमाम हुसैन अ.स. को खिराजे अक़ीदत पेश की।

शांतिपूर्ण रहा मुहर्रम

जिले भर में मुहर्रम के शांतिपूर्ण निपटने से जिला एवं पुलिस प्रशासन ने राहत की सांस ली है। संवेदनशील स्थानों पर तथा ताजिए के जुलूस को लेकर आपात स्थितियों से निपटने के लिए प्रशासन ने पूरी तैयारी कर रखी थी। ख़बर लिखे जाने तक कहीं से किसी अप्रिय घटना या विवाद की सूचना नहीं आयी। बड़ी संख्या में पुलिस बल की तैनाती और सतर्कता बरतने के निर्देश का कड़ाई से अमल किया गया।

अली असगर की शहादत का बयान सुनकर ज़ारो कतार रोये सामाईन

सेंथल। इससे पहले मौलाना रियाज़ असकरी ने तक़रीर करते हुये कहा कि “इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान में अपनी शहादत दे कर दीने इस्लाम को बचाया तो अल्लाह ने वादा किया कि ऐ हुसैन मैं तेरा ज़िक्र क़यामत तक बाकी रखूंगा।” मौलाना ने इमाम अली असगर की शहादत को बयान करते हुए कहा कि कर्बला के मैदान में जब इमाम हुसैन ने मैदाने कर्बला में एक आवाज़ बुलंद करते हैं कि है कोई जो मेरी नुसरत को आये इस आवाज को सुनकर जनाबे अली असग़र ने अपने को झूले से गिरा दिया जिससे खयामे हुसैनी में कोहराम बरपा हो जाता है। ये सुन कर इमाम हुसैन खैमे में आते हैं और कहते हैं कि बहन मेरी मौजूदगी में रोने का सबब क्या है? शहज़ादी कहती हैं कि आप की अवाज़ में इतना दर्द था कि जिसे सुनकर असग़र ने खुद को झूले से गिरा दिया है। इमाम हुसैन ने कहा कि लाओ बहन मैं असग़र का मकसद समझ गया और इमाम अली असग़र को लेके कर्बला के मैदान में आते है और फौजे यज़ीद से बच्चे के लिए पानी का सवाल करते हैं तो जवाब आया कि ऐ हुसैन अगर पूरी दुनिया पानी पानी हो जाये तब भी एक क़तरा पानी न दिया जायेगा। असग़र ने अपनी सुखी ज़बान अपने सूखे हुए होंठो पर फिराना शुरू किया तो फौजे यज़ीद मुंह फेर कर रोने लगी। ये देख उमरे साद ने हुर्मला को बुलाया और अली असग़र को क़त्ल करने का हुक्म दिया। हुर्मला ने तीन भाल का तीर चलाया तीर अली असग़र का गला छेदता हुआ इमाम के बाजू में लगा और अली असगर शहीद हो गए। उनकी शहादत का बयान सुनकर महफ़िल ज़ारो क़तार रोने लगी।

निर्धारित मार्गों से गुज़रा ताजिये का जुलूस

ताजिये का जुलूस बड़े इमामबाड़े से निकालकर अपने निर्धारित मार्गों से होते हुये सेंथल के बाज़ार जा पहुंचा जहां पर लोगों ने ब्लैड़, ज़जीर, कमां का मातम करते हुये इमाम हुसैन अ.स. को पुरसा दिया। इसके बाद निश्चित स्थानों पर ताजिए दफन किए गए। दस दिन के मातम के बाद ताजियों को दफन करने के साथ मुहर्रम की मजलिसों, सीनाजनी और नौहाख्वानी का समापन हुआ।
घरों, चौकियों, इमामबाड़ों व अजाखानों में रात भर जाकर रखे गए ताजिए जुलूस के रूप में कर्बला पहुंचे। ताजियों को दफनाने का सिलसिला कर्बला में हुआ।

यौमे आशूरा की महफ़िल को खिताब करते मौलाना रियाज़ अस्करी

Related posts