…और गुमनाम रह गईं नानी : नानियों को समर्पित प्रिया शुक्ला का आलेख

  • प्रिया शुक्ला

लोग नानी-नानी ही करते रह जाते हैं, नानियाँ अक्सर गुमनाम रह जाती हैं। नानियों का नाम ही नहीं लिया जाता। ये हैं मेरी नानी विंध्याचली देवी जिन्हें घर के सभी बच्चे “अम्माजी” कहते थे पर मेरी ये नानी थी। यदि आज ज़िंदा होती तो तक़रीबन नब्बे साल की होतीं। अपने वक़्त के सोच और रूढ़िवादी समाज में भी कमाल का आदर्श क़ायम किये थीं।

मेरी नानी विंध्याचली देवी

ढ़डनी गाँव के चौबे मास्टर साब की बेटी थीं। तो वहीं दूसरी तरफ़ गहमर गाजीपुर गाँव के पण्डित जी की बहु थीं। (मोहल्ले का नाम है पकड़ीतर) उनसे जुड़े लोग कहते हैं की वो लक्ष्मी स्वरूपा थीं क्योंकि उन्होंने अपने जीते जी कभी भी न कोई धन धान्य की कमी देखी, न कभी बँटवारा देखा और न ही परिवार में कभी किसी की अकाल मृत्यु ही देखीं थी। कहने का मतलब ये है कि जब तक जीवित थीं हर तरह से जीवन में सम्पन्नता थी। वास्तव में कमाल की महिला थी।

मेरा पुराना ननिहाल की जहाँ बचपन में हर गर्मी की छुट्टियों में जाना होता था। असीम प्रेम का भंडार नानी अपने सभी पोते, पोतियों और नाती, नातिन को एक समान प्यार करती थीं। बचपन में बिना ज़रूरत हमें पैसे नहीं मिलते थे लेकिन मुझे याद है नानी हम बच्चों की बैंक थीं। सीधे पल्ले की साड़ी के कोने में हमेशा कुछ रुपये बँधे रहते थे जिसे खोल कर लेने का सुखद आनंद अब मिल भी नहीं सकता। उनके साथ गंगा जी जाना लौटते वक़्त रास्ते से तरबूज़ और ख़रबूज़े की ख़रीदारी करना। घर आने पर मामी जी पैर धोतीं, फिर खाना, पीना, मौज मस्ती आह..हा..।

मेरी ननिहाल

नानी जी काश मैं आपके सामने मैं थोड़ी समझदार हो गयी होती। आपने हमारे लिए बहुत सपने देखे थे लेकिन जब उसकी कामयाबी को आपकी आँखों में देखने की बारी आई तो आप कहीं थीं ही नहीं। आपके बिना वो घर अब मेरे बचपन वाला ननिहाल नहीं लगता क्यूँकि जब भी वहां जाती हूँ तो खुली आँखों से सब भरा पूरा दिखता है पर बंद आँखों से बस आपका चश्मा, आपकी दवाइयों का डिब्बा, आपका बक्सा, भड़रवा घर, वाएँ हाथ की एक ऊँगली छोटी, माथे पर छोटी बिंदी, माँग में सिंदूर, हाथों की लाल चार चूड़ी, कान के चिकने वाले टॉप्स, गले की चेन, सीधे पल्ले की साड़ी और पाँव में हवाई चप्पल और आपका दिया हुआ हौसला नज़र आता है।

मेरी नानी विंध्याचली देवी की यादगार मुस्कुराहट

हज़ारों बातें याद आ रही हैं। ढेर सारा प्यार नानी आपको और आपकी वो झांकती सी आँखें (जिनमें अपनी बेटी की चिंता बसती थी ), बस वही तो दिखती है। जी नहीं चाहता कि अपनी आंखें खोलूँ, बहुत दर्द भर जाता है ये सब याद करके। ये सब बातें सिर्फ़ वही समझ सकता है जिसकी नानी नें ऐसा प्यार दिया हो या फिर किसी नें अपनी नानी से टूट कर प्यार किया हो। बहुत याद आती हो नानी तुम।

मेरी ही नहीं, सारी नानियों को सलाम। हो सके तो अपनी नानी का नाम कमेंट बॉक्स में लिखिए. क्यूँकि अक्सर नानियाँ गुमनाम रह जाती हैं, उनका नाम कहीं लिखा नहीं जाता।


लेखिका ओपिनियन टुडे की संस्थापक अतिथि संपादक हैं। प्रिया अमेरिका में रहती हैं तथा अमेरिका में भारतीयों के लिए संचालित शुद्ध देसी रेडियो में स्क्रिप्ट राइटर के पद पर कार्यरत हैं।