इस बीच, तेलंगाना में माओवादी संगठन की रीढ़ को हिलाने वाली एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां पार्टी के दो अग्रणी नेताओं ने हिंसा का रास्ता त्यागकर समर्पण कर दिया है. वरिष्ठ अधिकारियों के के हिसाब से, केंद्रीय माओवादी पार्टी के सचिव देव जी और पोलिटब्यूरो सदस्य मल्ला राजी रेड्डी ने हाल ही में तेलंगाना स्पेशल इंटेलिजेंस ब्यूरो (SIB) के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. यह घटना उस वक्त घटित हुई जब राज्य की खुफिया एजेंसियां लगातार संगठन के शीर्ष नेतृत्व पर दबाव बनाए हुए थीं.
रिपोर्ट्स के अनुसार, सूत्रों का कहना है कि यह समर्पण पिछले कुछ रोजों की गुप्त बातचीत और पुलिस की सक्रिय रणनीति का नतीजा है, जिसमें दोनों नेताओं ने मुख्यधारा में वापसी का निर्णय किया गया है. इस घटना का असर इसलिए भी गहरा माना जा रहा है क्योंकि देव जी को संगठन का मस्तिष्क माना जाता था. वह केंद्रीय सचिव के पद पर तैनात थे और पार्टी के फैसलों और रणनीति को तय करने में उनकी अहम भूमिका थी.
वहीं, मल्ला राजी रेड्डी पोलिटब्यूरो सदस्य होने के साथ-साथ संगठन के अनुभवी और मजबूत स्तंभों में से एक थे. दोनों नेताओं के सामने आत्मसमर्पण करने से तेलंगाना में सक्रिय माओवादी इकाइयों में खलबली मची हुई है.
एसआईबी (SIB) के अधिकारियों ने इस पूरे मामले को बड़ी सूझबूझ और गोपनीयता के साथ संभाला है. मिली जानकारी के मुताबिक, दोनों नेता लंबे दौर से संगठन की कार्यप्रणाली और अंदरूनी कलह से असंतुष्ट थे, जिसके चलते उन्होंने बंदूक की जगह शांति का साथ चुना. बंदूक के साथ गुलाब की नीति पिछले कुछ वर्षों में तेलंगाना पुलिस और SIB ने माओवादियों को समर्पण कराने के लिए बंदूक के साथ गुलाब की नीति अपनाई है. इसका नतीजा यह है कि कई जिलों से माओवाद का पूर्ण होने की राह दिख रही है.
मल्ला राजी रेड्डी का इतिहास रहा है कि वह जंगलों में सक्रिय रहे और उनके ऊपर कई मुकदमे भी दर्ज थे, लेकिन सरकार की पुनर्वास नीति ने उन्हें वापस लौटने का मौका दिया है. अधिकारियों का मानना है कि जब संगठन के इतने बड़े पदाधिकारी समर्पण करते हैं, तो यह पार्टी के निचले स्तर के कार्यकर्ताओं के लिए एक संदेश है कि हिंसा का रास्ता अब समाप्त हो चुका है. जानकारी के अनुसार, इस समर्पण से तेलंगाना के आदिवासी इलाकों में शांति स्थापित करने में एक नवीन मुकाम हासिल किया गया है.
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