डरी-डरी किसी कोने से झांकती हिन्दी

  • प्रदीप कुमार शर्मा

हिन्दी को पूर्ण भावात्मक लिपि यानी भाव से परिपूर्ण कहा गया है, दुनिया मे और कोई दूसरी भाषा ऐसी नही जोकि आपकी भावनाओं को दर्शा सके। अंग्रेजी भाषा के बढ़ते चलन और हिन्दी की अनदेखी को रोकने के लिए 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एकमत होकर यह निर्णय लिया की हिन्दी ही भारत की राष्ट्र भाषा होगी। इस महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिंदी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर 1953 से संपूर्ण भारतवर्ष में 14 सितंबर को ‘हिन्दी दिवस’ के रुप में मनाया जाने लगा। किसी भी राष्ट्र की पहचान उसकी भाषा और उसकी संस्कृति से होती है। आप कहीं भी जाएं हर देश की एक अपनी भाषा और अपनी एक अलग संस्कृति है। भारत में सबसे ज्यादा बोली जानें वाली हमारी मातृभाषा हिन्दी है। हमारे देश के लगभग 77 प्रतिशत लोग हिन्दी लिखते, पढ़ते और बोलते हैं।
विश्व में हिन्दी प्रचारित-प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलन का आयोजन आरंभ किया गया था। प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी, 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था। अत: 10 जनवरी का दिन ही विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। हिंदी भाषा की खास बात यह है कि इसमें जिस शब्द को जिस प्रकार से उच्चारित किया जाता है, उसे लिपि में लिखा भी उसी प्रकार जाता है। हिन्दी दिवस सभी विद्यालयों, महाविद्यालयों, शिक्षण संस्थानों में पूरे विश्वास के साथ मनाया जाता है उस दिन सभी अध्यापक अपने विद्यर्थियों को हिन्दी दिवस पर हिन्दी भाषा के बारे में भाषण देते हुए हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं देते है और विद्यार्थियों को हिन्दी मे भाषण बोलने व लिखने को कहा जाता है। हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों को हिन्दी दिवस यानी 14 सितंबर आने का इंतजार रहता है लेकिन दिलचस्प बात यह है कि अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए यह दिन एक पर्व के रूप में नही बल्कि एक दण्ड के रूप में आता है। अंग्रजी माध्यम के विद्यर्थियों में हिन्दी बोलने व लिखने का ज्ञान हिन्दी माध्यम के विद्यार्थियों की अपेक्षा काफी कम होता है जिस कारण उन्हें हिन्दी दिवस कुछ खास रास नहीं आता। हिन्दी मे भाषण देना तक तो ठीक है लेकिन हिन्दी मे कुछ लिखवाना उनके लिए दण्ड देने के समान होता है। दिलचस्प है कि ऐसा हर साल होने के बाद भी कुछ भी बदलाव नहीं होता।
हम सब हिंदी दिवस को मनाते हैं लेकिन यह कभी नही सोचते कि आख़िर क्यो हमें इस दिवस को मनाने की ज़रूरत पड़ी ? क्यों हम अपनी ही मातृभाषा को बोलने को बोलने की लिए कोई दिन निश्चित करें ? क्यों हमसे हमारी ही भाषा को छीन लिया जा रहा है ? क्यों आज हमें अपनी भाषा को बोलने में शर्म आती है ? शायद इसका जबाब किसी के पास नही है। हिंदी दिवस के दिन बड़े-बड़े पंडालों में खड़े होकर बड़े बड़े भाषणों में हिन्दी भाषा को संबोधित करते हैं। उसका महत्व बताते हैं फिर क्यों नहीं पूरे साल उसका पालन किया जाता है? क्यों हमारी हिंदी भाषा डरी डरी सहमी सी बन चुकी है? हम अपनी बात हिंदी में खुलकर कह सकते फिर क्यों हम अंग्रेजी में बार्तालाप करें? क्यों अंग्रेजी माध्यम के अध्यापक हिन्दी माध्यम के विद्यार्थी को हीन भावना से देखते हैं? केवल अंग्रेजी ना बोलने पर किसी छात्र की तुलना कमजोर विद्यार्थियों में कर क्यों उनका उपहास किया जाता है और फिर केवल 1 दिन के लिए क्यों हम महान बन जाते हैं? क्यों हम अपने भाषणों में हिन्दी का व्याख्यान करते हैं? यह सिर्फ एक औपचारिकता नहीं तो फिर और क्या है ?इस औपचारिकता को वास्तविकता में बदलने की जरूरत है।

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