जन्मदिन विशेष : इक सफर पर मैं रहा, मौलाना रूमी

  • आरिफ अंसारी

रूमी के मज़ार पर ये पंक्तियां लिखी हैं

” जब में मर जाऊं तोमेरे मकबरे को ज़मीन में मत खोजना, उसे लोगों के दिलों में खोजना” ।


मौलाना रूमी का पूरा नाम मौलाना मुहम्मद जलालुद्दीन रूमी है। इनका जन्म 30 सितम्बर, 1207 (सन 604 हिजरी) को अफगानिस्तान तत्कालीन फारस के मशहूर शहर बाल्ख में हुआ था। यह फारसी साहित्य के सूफी शायर थे। जिन्होंने मसनवी में महत्वपूर्ण योगदान किया है।

मौलाना रूमी के पिता शेख बहाउद्दीन अपने वक़्त के बहुत बड़े विद्वान थे जिनके उपदेश सुनने और फतवे लेने फारस के बड़े-बड़े अमीर और विद्वान आया करते थे। एक बार फारस के बादशाह से नाइत्तेफाकी होने वजह से बाल्ख शहर छोड़ दिया। वे अपने तीन सौ मुरीदों के साथ से रवाना हुए। जहां कहीं वे गए, लोगों ने उसका दिल से इस्तक़बाल किया और उनके उपदेशों से लाभ उठाया।


चौधरी शिवनाथसिंह शांडिल्य ने फारसी साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथ मौलाना मुहम्मद जलालुद्दीन रूमी कृत मसनवी की कुछ चुनी हुई शिक्षाप्रद कहानियों का हिन्दी अनुवाद किया है जो ईंट की दीवार के नाम से प्रकाशित हुआ है। इसके अतिरिक्त उन्होंने मौलाना रूमी की जीवनी भी लिखी है।


सफर करते हुए 1213 ईसवी (सन 610 हिजरी) में वे नेशांपुर नाम के शहर में पहुंचे। वहां उनसे मिलने मशहूर सूफी संत हज़रत ख्वाजा फरीदुद्दीन अत्तार आये। उस वक़्त मौलाना रूमी सिर्फ 6 साल के थे। ख्वाजा अत्तार ने जब उन्हें देखा तो बहुत खुश हुए और उनके वालिद शेख बहाउद्दीन से कहा, “यह बालक एक दिन महान पुरुष होगा। इसकी तालीम और देख-रेख में कमी न करना।” हज़रत ख्वाजा अत्तार ने अपनी मशहूर किताब मसनवी अत्तार बालक रूमी को दी।

मौलान रूमी शुरुआत में अपने वालिद सैयद बरहानउद्दीन से पढ़ा करते थे। उनकी मौत के बाद वह दमिश्क़ और हलब के मदरसों में पढ़ने के लिए चले गए। 15 साल बाद 40 साल की उम्र में वो वापस बगदाद लौटे। अब मौलाना रूमी की शोहरत इतनी बढ़ चुकी थी कि देश विदेश से लोग उनके दीदार करने और उनसे फतवा लेने आने लगे। इसी अरसे में उनकी मुलाकात मशहर दरवेश शम्स तबरेज़ से हुई।


कहा जाता है कि जब बे तरतीब बिखरे बालों वाले शम्स तबरेज़ का गुज़र हुआ तो रूमी किताबों के ढेर के पास बैठे कुछ पढ़ रहे थे। शम्स तबरेज़ ने उनसे पूछा, ‘तुम क्या कर रहे हो?’ रूमी को लगा कि वह कोई अनपढ़ अजनबी है। इसलिए उन्होंने तंज कसते हुए जवाब दिया, “मैं जो कर रहा हूं, उसे तुम नहीं समझ पाओगे”। यह सुन कर शम्स ने किताबों के ढेर को, जो रूमी की खुद की लिखी हुई थीं, उठा कर पास के एक तालाब में फेंक दिया। रूमी जल्दी से भाग कर उन किताबों को तालाब से निकाल लाए और यह देख कर हैरान रह गए कि वे सभी किताबें सूखी थीं। रूमी ने शम्स से पूछा, ‘यह सब क्या है?’ शम्स ने जवाब दिया “मौलाना इसे आप नहीं समझ पाएंगे।


शम्स तबरेज़ की शिक्षाओं का ऐसा प्रभाव पड़ा कि रात-दिन आत्मचिन्तन और साधना में संलग्न रहने लगे। उपदेश, फतवे ओर पढ़ने-पढ़ाने का सब काम बन्द कर दिया। जब उनके मुरीदों ने उनकी यह हालत देखी तो उन्हें शक हुआ कि शम्स तबरेज़ ने रूमी पर जादू कर दिया है। मौलाना रूमी के मुरीद और साथी शम्स तबरेज़ से जलन करते थे। एक रात मौलाना रूमी और शम्स तबरेज़ आपस में बात कर रहे थे, तभी शम्स को किसी ने पिछले दरवाजे पर बुलाया। वह बाहर गए और फिर उसके बाद उन्हें किसी ने नहीं देखा। ऐसा कहा जाता है कि रूमी के बेटे अलाउद्दीन की मिलीभगत से शम्स का कत्ल कर दिया गया। शम्स तबरेज़ से बिछड़ने के बाद रूमी बहुत परेशान हो गए। उनके ऊपर एक तरह का आध्यात्मिक उन्माद छा गया। वह गलियों में नाचते हुए घूमते और सहज स्वाभाविक गाने गाते। धीरे-धीरे उनके इस नाच-गाने ने ‘समा’ का रूप ले लिया, जिसमें उनके सारे मुरीद शरीक होने लगे।


‘समा’ एक तरह की प्रार्थना है, जो नाचते-गाते हुए की जाती है। अब इसे दरवेशों के द्वारा किए जाने वाले नृत्य के रूप में जाना जाता है।


मौलाना रूमी ने अपने सबसे प्यारे मुरीद मौलाना हसामउद्दीन चिश्ती के कहने पर ‘मसनवी’ की रचना शुरू की। कुछ दिन बाद वह बीमार हो गये और फिर ठीक नहीं हो सके। 17 दिसम्बर 1273 (672 हिजरी) को 66 वर्ष की उम्र में इनका इंतक़ाल हो गया। उनकी मज़ार क़ौनिया में बनी हुई है।

मौलाना रूमी की ग़ज़लें

1. बिन मेरे

इक सफर पर मैं रहा, बिन मेरे
उस जगह दिल खुल गया, बिन मेरे

वो चाँद जो मुझ से छिप गया पूरा
रुख़ पर रुख़ रख कर मेरे, बिन मेरे

जो ग़मे यार में दे दी जान मैंने
हो गया पैदा वो ग़म मेरा, बिन मेरे

मस्त शम्से तबरीज़ के जाम से हुआ
जामे मय उसका रहता नहीँ बिन मेरे।

2. हंगामे रात के

हम आ गए चूँकि हंगामे में रात के
ले आये क्या-क्या दरया से रात के

रात के परदे में है वो छिपा हुआ गवाह
दिन भला बराबर में है कब रात के

सोना चाहेगा नहीं, नींद से करे गुरेज़
जो कि देखे नहीं उसने तमाशे रात के

जान बहुत पाक और बस पुरनूर दिल
बँधा रहा, लगा रहा, बन्दगी में रात के

मुझे फ़ख़्र अपने शम्सुद्दीन तबरेज़ी पर
हसरतें दिन की तू तमन्ना रात के।

3. मैकदे में आज

नशे से बैठे हैं रिन्दो जैसे मैकदे में आज
ज़हद न करेंगे और न नमाज़ पढ़ेंगे आज

क्या बोलूं क्या महफ़िल क्या मय है आज
क्या साक़ी, क्या मेहरबानी, क्या लुत्फ़ आज

ना हिज्र का कोई निशान है, ना बू है
दिलदार से मेल और विसाल है आज

आज मिलते तोहफ़े और चुम्मे साक़ी से
प्याले हैं, मस्तियां हैं, और शराबें हैं आज

शम्सुद्दीन तबरेज़ी ने की न कोई खुराफात
तौहीद की मय ढाल सब यारों को दी आवाज़।

4. हमारे सुरसाज़

चाहे तोड़ दो हमारे साज़ अय मुल्ला
साज़ हमारे पास हजारों और भी हैं

इश्क़ के पन्जों में हम गिर गए जो
क्या फ़िक्र जो बाजे-बन्सी कम हुए हैं

सारे जहाँ के साज़ जो जल भी जाएँ
बहुत सुरसाज़ तो भी छिप कर खड़े हैं

तरंग और तान उनकी गई आसमां तक
मगर उन बहरे कानों में कुछ आता नहीं है

तो बन्द कर ये मुँह और दर खोल दिल का
उस राह से बातें रूहों से फिर किया कर

5. मूल के मूल में आ

कब तलक उलटा चलेगा, अब सीधे आ
छोड़ कुफ़्र की राह, अब चल दीन की राह
इस डंक में देख दवा, और डंक खा
अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ

हरचंद है तू इस मिट्टी का ही बना
सच के मोती के धागों से अन्दर बुना
ख़ुदाई नूर का ख़ज़ांची तुझको चुना
अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ

शम्स तबरेज़ी हैं हमारे शाह और साक़ी
दे दिया हमारे हाथों में जामे बाक़ी
सुबहान अल्ला ख़ालिस ये शराब जा पी
अपनी ख़ाहिश के मूल के मूल में आ।

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