रमजान के महीने में एक नेकी के बदले मिलता है सत्तर नेकियों का सवाब

रमजान का पाक महीना शुरू हो गया है जहां इस महीने में खुदा ए ताला रोजेदार पर अपनी रहमतों की बारिश करता है वहीँ यह पाक महिना तमाम आलम ए इंसानियत को मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का संदेश भी देता है. इसी महीने में कुरआन क़ुरान नाजिल हुआ था. रोजे की हालत में इबादत करने बालो के अल्लाह सारे गुनाह माफ़ कर देता है. इस माहे रमजान की फ़ज़ीलत के बारे में बता रहे हैं बरेली के मशहूर इस्लामिक स्कॉलर व दारूल इफ्ता के मुफ्ती व काजी हजरत अल्लामा मुफ्ती मोहम्मद साजिद हसनी कादरी. 

मुफ्ती साजिद हसनी क़ादरी

रमज़ान के इस पाक महीने में अल्लाह अपने बंदों पर रहमतों का खजाना लुटाता है और भूखे-प्यासे रहकर खुदा की इबादत करने वालों के गुनाह माफ हो जाते हैं. इस माह में दोजख (नरक) के दरवाजे बंद कर दिए जाते हैं और जन्नत की राह खोल दी जाती है. हजरत अल्लामा मुफ्ती मोहम्मद साजिद हसनी कादरी रमजान की फ़ज़ीलत बयान करते हुए बताते हैं कि रोजा अच्छी जिंदगी जीने का प्रशिक्षण है जिसमें इबादत कर खुदा की राह पर चलने वाले इंसान का जमीर रोजेदार को एक नेक इंसान के व्यक्तित्व के लिए जरूरी हर बात की तरबियत देता है.

पूरी दुनिया की कहानी भूख, प्यास और इंसानी ख्वाहिशों के गिर्द घूमती है और रोजा इन तीनों चीजों पर नियंत्रण रखने की साधना है. रमजान का महीना तमाम इंसानों के दुख-दर्द और भूख-प्यास को समझने का महीना है ताकि रोजेदारों में भले और बुरे को समझने की सलाहियत पैदा हो. रोजे के दौरान झूठ बोलने, चुगली करने, किसी पर बुरी निगाह डालने, किसी की निंदा करने और हर छोटी से छोटी बुराई से दूर रहना ज़रूरी है. रोजे रखने का असल मकसद महज भूख-प्यास पर नियंत्रण रखना नहीं है बल्कि रोजे की रूह दरअसल आत्म संयम, नियंत्रण, अल्लाह के प्रति अकीदत और सही राह पर चलने के संकल्प और उस पर मुस्तैदी से अमल में बसती है. दुनिया के लिए रमजान का महीना इसलिए भी अहम है क्योंकि अल्लाह ने इसी माह में हिदायत की सबसे बड़ी किताब यानी कुरान शरीफ का दुनिया में अवतरण शुरू किया था. रहमत और बरकत के नजरिए से रमजान के महीने को तीन हिस्सों (अशरों) में बाँटा गया है. इस महीने के पहले 10 दिनों में अल्लाह अपने रोजेदार बंदों पर रहमतों की बारिश करता है. दूसरे अशरे में अल्लाह रोजेदारों के गुनाह माफ करता है और तीसरा अशरा दोजख की आग से निजात पाने की साधना को समर्पित किया गया है.

सदक़ा ए फ़ित्र देना है बाजिब 

मुफ्ती नूर मोहम्मद हसनी कादरी बताते हैं कि रमजान के बाद और ईद से पहले सदका ए फ़ित्र अदा करना बाजिब (जरूरी) है जो व्यक्ति इतना मालदार है कि उस पर जकात वाजिब है तो उसे अपनी जकात के साथ साथ व अपनी नाबालिग औलाद की तरफ से सदका ए फित्र देना जरूरी है उसके वाजिब होने की तीन शर्तें हैं 1) आजाद होना,  2) मुसलमान होना 3) किसी ऐसे माल का मालिक होना जो असली जरूरत से ज्यादा हो तो उस माल पर साल गुजरना शर्त नहीं है और न ही माल का तिजारती होना है यहाँ तक कि नाबालिग और वह बच्चें ईद के दिन (तुलू ए आफताब) सूरज निकलने से पहले पैदा हुए हों और मजनूनो पर भी सदका ए फित्र निकालना बाजिब (जरूरी) है. सदका ए फित्र के तौर पर 2 किलो 45 ग्राम गेहूं या उसके आटा की कीमत अदा की जाती है. बेहतर है कि कीमत अदा करे, इस वक़्त एक व्यक्ति पर लगभग 40 रुपये सदका ए फित्र बन रहा है लिहाजा जो उसके हकदार हैं जैसे गरीब, यतीम बे सहारे उन तक रकम पहुंचा दी जाए ताकि वह जरूरत मन्द लोग अपनी अपनी ज़रूरतें अपने वक्त पर पूरी कर सकें, जब तक सदका ए फित्र अदा नहीं किया जाता है तब तक रमज़ान के महीने में की गयीं सारी इबादतें व रोजे जमीन आसमान के बीचो बीच लटकते रहते हैं. सदक़ा ए फ़ित्र अदा करने के बाद सारी इबादतें बारगाहे इलाही में पहुंच जाती हैं और रोजे व इबादतों में किसी किस्म कमी रह जाती है तो सदका ए फित्र उसे पूरी कर देता है.